Monday, September 1, 2014

Shree Krishna Leela Tarangini Song 2

 श्लोक:
       अमृतकलशहस्तं श्रीपतेर्यानकेतुम्
        सुररिपुनिवहारिं सोमसूर्यादिगीतम्
        अमितबलमशेषप्राणिनां प्राणभूतम्
        निगममयशुभाङ्गं भावयाम्याप्तकामम् ।।३।।

        वैनतेयं विराजन्तं विष्णुवाहनमुत्तमम्
        वैकुण्ठाश्रयमाम्नायकायं गायामि कामदम्।।४।। 

गीतं ।।२।।

मुखारी - अटताल:

प।।      श्रीनारायणवाहन श्रितमुनिजन मण्डलपालन ।।
अनु ।।   विनतावर तनय वेदाङ्गशुभकाय
         विविधाविश्वालय वीर मां पायल ।।श्री।।

         सकलजगत्प्राणदायक सुरसन्नुत सर्व विनायक
         विकट सुर रिपुविदारक विश्वविपुलकल्याणविधायक
         अकळङ्क शितिकण्ठ आश्रितवैकुण्ठ
         विकचकमलतुण्ढ विगतमोहकाण्ड
         शकलितपाषण्ढ शत्रुहर प्रचण्ड
         अधिकबलोद्दण्ड अद्भुतदोर्दण्ड  श्री.... १।।

         अशुभतिमिरचण्डभास्कर सामविशदघोषपक्षभासुर
         मशकीकृतसकलासुर मञ्जुमणिरशनाशेषशुभकर
         असुरभयङ्कर अमृतकलशहर
         कुसुमनिचयभार क्रूरभुजगहार
         असद्दशाचलाकार आश्रितशुभकर
         लसदरुणाधर लीलामयशरीर     श्री.... २।।

         निरवधिकामलपराक्रम नित्यनिर्मल खलदुरतिक्रम
         मुररिपुचरणाब्जसंभ्रम मुनिनारायणतीर्थमतिरम
         अरविन्दलोचन अघबन्धमोचन
         सुररिपुशासन सोमरविनयन
         परिजनपालन पामरविदळन
          कृतगुरुसेवन गोकुलभवन        श्री.... ३।।  
        


 

Thursday, August 14, 2014

Shree Krishna Leela Tarangini Part 1

                        श्री कृष्ण लीला तरङ्गिणी
                                प्रथमस्तरङ्ग:

श्लोक:   हिमगिरितनया पत्यं हेमाचल चाप समुदितम् तेज:
           किमपि महत्तममाद्यं स्मर्तव्यं विघ्नतिमिर हरणाय ।।१।।
           गिरिराजसुतासूनु: करिराजवरानन:
           परिपन्थिगणध्वंसी सुरसेव्यो विराजते ।।२।। 


                       गीतं ।।१।।

              मोहनम्      अटताळशापू

प ।         जय जय स्वामिन् जय जय ।
अनु ।       जय जय जितवैरिवर्ग प्रचण्ट ।
             जय जय गजमुख जय वक्रतुण्ड ।      - जयजय ।

             मूषकवाहन मुनिगणवन्द्य
             दोषरहित दुरितासुरबृन्द
             शेषभूषण शिववारिधिचन्द्र
             पोषितपरिजन पुण्यैककन्द ।            - जयजय ।।१।।

            अद्रिसुतासुत अनवद्यचरित
            भद्र भक्तभव भयहर मुदित
            रुद्रोदित ऋजु-मस्तकसहित
            सद्रूप सरसिज समुदितविनुत             - जयजय ।।२।।

            लम्बोदर धीर लावण्य सार
            कम्बुसुधानिधि कर्पूरगौर
            साम्बसदाशिव सत्कृतिचतुर
            सामवेदगीत सकलाधार                 - जयजय ।।३।।

            शक्रादिसुरगण सन्नुत चरण
            शातकुम्भमणि दिव्याभरण
            धिक्कृतघनविघ्न तिमिरावरण
            धीर नारायण तीर्थ सुकरुण              - जयजय ।।४।। 
                              
         

Narayana Teerthar's tarangams.....

On account of Krishna Ashtami, I am starting to post Narayana Teerthar's Tarangams. I hope it will be useful to people who love these tarangams which is full of sincere prayers to the lord and which describes Lord Krishna's playful acts.

                   श्री नारायण तीर्थध्यान श्लोका:

यदङ्घ्रि पङ्केरुहरेणुलग्नम्
निपीय नीरं विमलान्तरङ्ग:
जानामि तत्वं निजमात्मरूपम्
तं नौमी नारायण तीर्थमार्यम् ।।१।।

यन्नाम्न: पठनं मनागपि यतेरोङ्कारलक्षाधिकम्
यन्मूर्तेरपि पूजनम् हरि हर ब्रह्मादिपूजा स्मृतम्
सत्कार्यों त्रिविधम् समस्त जगताम् शास्त्रार्थनिर्णायकम्
श्री नारायण तीर्थ सद्गुरुवरं तं नौमी मुक्तिश्रियै ।।२।।

वेदान्तार्थ विचार गम्य धिषणा विध्वस्तभेदाशयम् 
नानातन्त्र पदार्थ संशयघनध्वान्तार्क तुल्यं गुणै:
नानादेशदिगन्तसन्ततयश: प्राप्तावकाशं गुरुम्
श्री नारायण तीर्थ सद्गुरुवरं तं नौमी मुक्तिश्रियै ।।३।।

बोधा गाध सुनिर्मलाति मधुरे यन्मानसाब्धौ हरि:
क्रीडत्युज्झित दुग्ध सिन्धुरनिशं शान्त्यादिदूतीजनै:
भक्तिज्ञप्तिविरक्ति संज्ञमतुलं कन्यात्रयं प्राप य:
श्री नारायण तीर्थ सद्गुरुवरं तं नौमी मुक्तिश्रियै ।।४।।

 

Wednesday, August 13, 2014

Ganesh Kavacham


ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम्।
द्वापरे तु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुं
तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥१॥
 
विनायकः शिखां पातु परमात्मा परात्परः।
अतिसुन्दरकायस्तु मस्तकं महोत्कटः॥२॥


ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः।
नयने फालचन्द्रस्तु गजास्यस्त्वोष्ठपल्लवौ॥३॥


जिह्वां पातु गणक्रीडश्चिबुकं गिरिजासुतः।
वाचं विनायकः पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ॥४॥


श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः।
गणेशस्तु मुखं कण्ठं पातु देवो गणञ्जयः॥५॥


स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥६॥


धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥७॥


गणक्रीडो जानुजंघे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान्।
एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु॥८॥


क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः।
अंगुलींश्च नखान् पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः॥९॥


सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु।
अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु॥१०॥


आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीशः आग्नेयां सिद्धिदायकः॥११॥


दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैरृत्यां  तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ताव्याद्वायव्यां गजकर्णकः॥१२॥


कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः ।
दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत्॥१३॥


राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचतः  ।
पाशाङ्कुशधरः पातु रजस्सत्वतमःस्मृतिम् ॥१४॥


ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम्।
वपुर्धनं च धान्यं च गृहदारान् सुतान् सखीन्  ॥१५॥


सर्वायुधधरः पौत्रान् मयूरेशोऽवतात्सदा ।
कपिलोऽजाविकं पातु गजाश्वान् विकटोऽवतु॥१६॥


भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत् सुधीः।
न भयं जायते तस्य  यक्षरक्षपिशाचतः ॥१७॥


त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत्।
यात्राकाले पठेद्यस्तु  निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥१८॥


युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्द्रुतम् ।
मारणोच्चाटनाकर्षस्तंभमोहनकर्मणि  ॥१९॥
 

सप्तवारं जपेदेतद्दिनानामेकविंशतिम्।
तत्तत्फलमवाप्नोति साध्यको नात्रसंशयः ॥२०॥


एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यश्च मोचयेत् ॥२१॥


राजदर्शनवेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥२२॥

Thursday, July 24, 2014

Chidambareswara Stotram

कृपा समुद्रं सुमुखं त्रिनेत्रम्
जटाधरम् पार्वती वाम भागम्
सदा शिवं रुद्रम् अनन्त रूपम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।१।।

वाचामतीतम् फणी भूषणाङगम्
गणेश तातम् धनदस्य मित्रम्
कन्दर्प नाशम् कमलोत्पलाक्षम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।२।।

रमेश वन्द्यम् रजताद्रिनाथम्
श्री वामदेवम् भव दु:ख नाशम्
रक्षाकरम् राक्षस पीडीतानाम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।३।।

देवादिदेवं जगदेकनाथम्
देवेश  वन्द्यम् शशि गण्ड चूडम्
गौरी समेतम् कृत विघ्न दक्षं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।४।।

वेदान्तवेद्यम् सुरवैरिविघ्नम्
शुभप्रदम् भक्तिमदन्तराणाम्
कालान्तकम् श्रीकरुणाकटाक्षम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।५।। 

हेमाद्रिचापम् त्रिगुणात्मभावम्
गुहात्मजम् व्याघ्रपुरीशमाद्यं
श्मशानवासम् वृषवाहनस्थम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।६।।


आध्यन्त शून्यम् त्रिपुरारिमीशम्
नन्दीशमुख्यस्तुतवैभवाढ्यम्
समस्त देवै: परिपूजिताङ्घ्रिम्
 चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।७।।
 
तमेव भान्तम् ह्यनुभाति सर्वम्
अनेकरूपं परमार्थमेकम्
पिनाकपाणिम् भवनाशहेतुम्
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।८।।

विश्वेश्वरं नित्यमनन्त माद्यम्
त्रिलोचनम् चन्द्र कलावतंसं
पतिं पशूनाम् हृदि सन्निविष्टं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।९।।     

विश्वाधिकम् विष्णुमुखैरूपास्यं
त्रिलोचनम् पञ्चमुखं प्रसन्नम्
उमापतिं पापहरम् प्रशान्तं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ।।१०।।

कर्पूरगात्रं कमनीयनेत्रं
कंसारिमित्रं कमलेन्दुवक्त्रम्
कन्दर्पगात्रं कमलेशमित्रं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ ११ ॥

विशालनेत्रं परिपूर्णगात्रं
गौरी कलत्रं हरिदम्बरेशम्
कुबेरमित्रं जगतः पवित्रं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ १२ ॥

कल्याणमूर्तिं कनकाद्रिचापं
कान्ता समाक्रान्त निजार्द्धदेहम्
कपर्दिनं कामरिपुं पुरारिं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ १३ ॥

कल्पान्त कालाहितचण्डनृत्तं
समस्त वेदान्त वचोनि गूढम्
अयुग्मनेत्रं गिरिजासहायं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ १४ ॥

दिगंबरं शङ्खसिताल्पहासं
कपालिनं शूलिनम् अप्रमेयम्
नागात्मजम् वक्त्रपयोज सूर्यं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ १५ ॥

सदाशिवं सत्पुरुषैर नेकैः
सदार्चितं सामशिरस्सुगीतम्
वैय्याघ्रचर्मांबरमुग्रमीशं
चिदम्बरेशम् हृदि भावयामि ॥ १६ ॥

चिदम्बरस्य स्तवनं पठेद्य:
प्रदोषकालेषु पुमान् स धन्यः ।
भोगना शेषाननुभूय भूयः
सायुज्यमप्येति चिदम्बरस्य ॥ १७ ॥




 

Ganesh Stotras.

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटी समप्रभ
निर्विघ्नम् कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ।।१।।

गजाननं भूत गणाधि सेवितं
कपिथ्थ जम्बू फल सार भक्षितम्
उमासुतम् शोक विनाश कारणम्
नमामि विघ्नेशवर पाद पंकजम् ।।२।।

मूषिक वाहन मोदक हस्ता
चामर कर्ण विलंबित सूत्र
वामन रूप महेश्वर पुत्र
विघ्न विनायक पाद नमस्ते ।।३।।

प्रकाश स्वरूपं नमो वायु रूपं
लिकारादि हेतुमं कलाधार भूतम्
अनेक क्रिया योग शक्ति स्वरूपं
सदाविश्वरूपं गणेशम् नमामी ।।४।। 

Tuesday, July 1, 2014

Devi Stuti

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम ।।

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नम:
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नम: ।।

कल्याण्यै प्रणतां वृध्द्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नम:
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नम: ।।

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नम: ।।

 अति सौम्याति-रौद्रायै नतास्तस्यै नमो नम:
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्य नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण  संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

इन्द्रियाणा-मधिप्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या
भूतेषु सततं तस्यै वियाप्तिदेव्यै नमो नम:

चितिरूपेण या कृत्स्न-मेतद्-व्याप्य स्थिरता जगत्
नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नम: ।।

स्तुता सुरै: पूर्वमभीष्ट-संश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविका
करोतु सा न: शुभहेतुरीश्र्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:।।

या साम्प्रतं चोध्दत-दैत्य-तापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति न:सर्वापदो भक्ति-विनम्र-मूर्तिभि:।।